Friday, December 3, 2021
पुस्तक समीक्षा - वह साँप सीढ़ी नहीं खेलता! गणेश गनी का कविता संग्रह "वह साँप सीढ़ी नहीं खेलता" लोकोदय प्रकाशन से जनवरी 2019 में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में 59 कवितायेँ हैं और लगभग सभी छोटे आकार की ही...
1. बाल कविता आओ हम स्कूल चले नव भारत का निर्माण करें। छूट गया है जो बंधन भव का आओ मिलकर उसको पार करें, आओ हम स्कूल चले ..... जाकर स्कूल हम गुरुओं का मान करें बड़े बूढ़ों का कभी न हम अपमान करें, आओ हम स्कूल चले....... जाकर स्कूल हम दिल लगाकर...
सही गलत किसी बात से व्यथित मन,   व्यथित मन ने लिया ठान, क्या सही है क्या है गलत? अब तो वह यह लेगा जान। विचारों के विमान संग,  उड़ता फिर रहा था मन।  फिर दृश्य एक देखकर,  मन गया वही पर थम ।  ठीक उसी स्थान पर, खत्म हो...
कविता - क्या तब? तप्त अग्नि में जलकर राख हो जाऊंगा। एक दिन मिट्टी में मिलकर खाक हो जाऊंगा। तब मिट्टी को रौंदकर क्या मुझे  याद करोगे? झूठे ख्वाबों की शायरी से क्या मेरा इंतजार करोगे? करना है इश्क़ तो अब कर सनम। लगा सीने से तस्वीर को क्या तब याद...
कविता – नए प्रतिबिम्ब खो गए हैं वक्त के आईने से, जो सपने संजोए थे मैंने, समेटने की, कि थी कोशिश बहुत, पर बिखर गए सैलाब बन कर। धूमिल होते आईने पर उभर रहे हैं, प्रतिबिम्ब नए नए ! मिलते नहीं निशाँ साफ़ करने पर भी, छिप गए हैं धूल में, करवट बदल कहीं……… रह...
कविता- दर्द मिटा दूँगा तेरे दर्द को अल्फ़ाज़ दूंगा, मत सोच तू अकेला हैं हर कदम पर तेरा साथ दूंगा। दर्द का समुंदर जो तेरे अंदर, नित्य रफ़्ता रफ़्ता बहता है उसको भी एक दिन किनारा दूंगा। जिस ख़ामोशी में समा रखा है छट पटाता तूने दर्द...
वक्त बदले ज़िन्दगी  वक्त बदला एहसास बदले कल बदला और आज बदले । कुछ लम्हे बदले कुछ स्वयं से हैं सवाल बदले। वक्त है ,फिर बदलेगा इसके बदलते ही , हर बवाल बदले । तुम नहीं बदले आज भी वक्त ने हैं हालात बदले। जी ले जिन्दगी को जी भर...
कविता - हिंदी हिंदी भाषा की शान है, हिंदी को देते हम सम्मान हैं। हिंदी हमें सब कुछ सिखाती है। व्याकरण का ज्ञान करवाती है। हिंदी भारतीयों की भाषा है इसमें हमें न कोई निराशा है। हिंदी सबको बोलनी आती है, सबके दिलों को भांति है । देश की माथे की बिंदी है, राजभाषा हिंदी है। खुशबू नौवीं...
चेयरमैन साहब कुछ दिनों से परेशान चल रहे थे, उनकी समझ में नहीं आ रहा था की फेसबुक में उन्होंने 5000 दोस्त बना रखे हैं और क्यों नहीं बन रहे? चाहते तो साहब 5 लाख बनाना पर कमबख्त जकरबर्ग...
1. शहर की झूठी शान में आके, घरो से निकले गांव के बाँके एक होड़ है किसी मोड़ पर पहुंचने की, अब न जाने, वो मंजिल है या मिराज है। दुनिया वाले तो यही कहते है कि, जीने का यही सही...
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