Wednesday, October 28, 2020
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हिमाचली साहित्य

भोग विलासी, अत्याचारी, चाहे राजा हो दुर्व्यव्हारी। यशोगीत वो गाते थे, दिन को कह दे रात अगर वो , तो रात ही बताते थे। ये तो उनका काम था,  इसी से चुल्हा जलता था। क्यों ना करते जी हज़ूरी,  परिवार इसी से पलता था।  उनके तो कई कारण...

यूँ ही

ईश्वर हमारी कृति है,  मंदिर में प्रवेश तुम्हारी गुस्ताखी है । आस्था, आशीर्वाद, पूजा हमारे हिस्से,  तुम्हारे लिए ईश्वर का डर ही काफी है । रोटी - बेटी की बात तो सोचो ही मत तुम,  हमारे रास्ते, घर, कुएँ को छुने की सोचना ही...
कविता - तृतीय विश्व युद्ध विकास के पहिए शहरों की ढेर सारी आबादी को वापिस छोड़ आए हैं गांव ये कहकर, कि यही है सबसे सुरक्षित ठिकाना अनिश्चितकाल के लिए गांव की प्रतिष्ठा में लग गए हैं चार चांद! जब, एक वायरस लील रहा है कई जिंदगियों को ऐसे...
 1. दर्द दर्द को समझने के लिए पहले मैंने बाजू में चीरा लगाया, फिर भी मुझे, वह दर्द महसूस नहीं हुआ। फिर मैंने ज़ख्म में नमक मिला लिया, पर फिर भी मुझे, उतना दर्द नहीं हुआ। मैं समझ नहीं पा रहा था आखिर क्यों... वह दर्द खुद को यातना देने...
1. बाल कविता आओ हम स्कूल चले नव भारत का निर्माण करें। छूट गया है जो बंधन भव का आओ मिलकर उसको पार करें, आओ हम स्कूल चले ..... जाकर स्कूल हम गुरुओं का मान करें बड़े बूढ़ों का कभी न हम अपमान करें, आओ हम स्कूल चले....... जाकर स्कूल हम दिल लगाकर...
कविता - हिंदी हिंदी भाषा की शान है, हिंदी को देते हम सम्मान हैं। हिंदी हमें सब कुछ सिखाती है। व्याकरण का ज्ञान करवाती है। हिंदी भारतीयों की भाषा है इसमें हमें न कोई निराशा है। हिंदी सबको बोलनी आती है, सबके दिलों को भांति है । देश की माथे की बिंदी है, राजभाषा हिंदी है। खुशबू नौवीं...
हिंदी हिंद की शान है, बिंदी जिसकी पहचान है। हिंदी जननी है मातृभाषा अभिमान है, जिस पर हमे आता। फूल पत्तों जैसी ये खिलती। हर भाषा में जा, ये गुल मिलती। स्वर व्यंजन जिसकी पहचान है। संयुक्त वर्ण जिसकी शान हैं। अर्ध अक्षर भी जिसका देता भाषा में, एक नई जान है। हिंदी हिंद की...
अलविदा मानसून तुम इस बार कुछ उखड़े उखड़े से रहे! महज़ एक दो बार ही जम कर बरस सके, बाकी सिर्फ आसमान से ही ताकते रहे और हँसते रहे इंसानों के जंगल राज पर! जो रात दिन लगा हुआ है...
कविता - बहते हुए तूफ़ान बहते हुए तूफान में मैं भी बहता रहा, कभी तूफान बन कर कभी दरिया की नाव बनकर। लोग सोचते रहे, मैं डूब गया। किसी गुमनाम तैराक की तरह। पर स्थिर रहा मैं, किसी अडिंग चट्टान की तरह। टकराता रहा मैं भी, तूफानी दरिया के पानी की...
बाल कविता - कुमारी संजना की कविता गुरु हमें शिक्षा सिखाते, जिदंगी मे आगे बढ़ने  की राह दिखाते। गुरु हमें संस्कार सिखाते, अच्छे कर्मों को करने की राह दिखाते। गुरु हमे सच बोलना सिखाते, झूठ न बोलने की राह दिखाते। गुरु हमें देश मे ऊँचा...
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