Saturday, October 23, 2021
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हिमाचली साहित्य

गुरूकुल बहुमुखी शिक्षा संस्था द्वारा ग्लोबल विलेज स्कूल रोपा में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ से आये जाने माने कवि और चित्रकार कुँवर रविंदर को गुरुकुल राज्य सम्मान 2018 से सम्मानित किया। श्री रवींद्र जी 18000 से अधिक चित्र बना चुके हैं...
कविता - तृतीय विश्व युद्ध विकास के पहिए शहरों की ढेर सारी आबादी को वापिस छोड़ आए हैं गांव ये कहकर, कि यही है सबसे सुरक्षित ठिकाना अनिश्चितकाल के लिए गांव की प्रतिष्ठा में लग गए हैं चार चांद! जब, एक वायरस लील रहा है कई जिंदगियों को ऐसे...
चेयरमैन साहब कुछ दिनों से परेशान चल रहे थे, उनकी समझ में नहीं आ रहा था की फेसबुक में उन्होंने 5000 दोस्त बना रखे हैं और क्यों नहीं बन रहे? चाहते तो साहब 5 लाख बनाना पर कमबख्त जकरबर्ग...
कविता – नए प्रतिबिम्ब खो गए हैं वक्त के आईने से, जो सपने संजोए थे मैंने, समेटने की, कि थी कोशिश बहुत, पर बिखर गए सैलाब बन कर। धूमिल होते आईने पर उभर रहे हैं, प्रतिबिम्ब नए नए ! मिलते नहीं निशाँ साफ़ करने पर भी, छिप गए हैं धूल में, करवट बदल कहीं……… रह...
सही गलत किसी बात से व्यथित मन,   व्यथित मन ने लिया ठान, क्या सही है क्या है गलत? अब तो वह यह लेगा जान। विचारों के विमान संग,  उड़ता फिर रहा था मन।  फिर दृश्य एक देखकर,  मन गया वही पर थम ।  ठीक उसी स्थान पर, खत्म हो...
कविता – अपनी अपनी शाम १.                          बेनाम सी जिन्दगी जीने लगे है, हर शाम अब पीने लगे है। नाकामी का ठीकरा, रोज भरता है, रोज टूटता है। फिर दिल में दर्द फूटता है, दर्द...
एक बस सफर के दौरान बस में लिखे वाक्य “सोचो,साथ    क्या जाएगा”को पढ़ कर इस कविता का विचार मन में आया था। सोच,साथ क्या जाएगा? “अनमोल बड़ी है ये जिंदगी,खुशी से इसे  बीता ले तू। बड़े बड़े हैं सपने तेरे,हकीकत इन्हें...
कविता - बहते हुए तूफ़ान बहते हुए तूफान में मैं भी बहता रहा, कभी तूफान बन कर कभी दरिया की नाव बनकर। लोग सोचते रहे, मैं डूब गया। किसी गुमनाम तैराक की तरह। पर स्थिर रहा मैं, किसी अडिंग चट्टान की तरह। टकराता रहा मैं भी, तूफानी दरिया के पानी की...
जब गुजरता हूं खुद किसी भयावह स्थिति से, तो सोचता हूं अक्सर उसकी वजह  मैं। चाहता हूं मिटा दूं उस वजह को ही, पर लौट आता हूं अक्सर उसी जगह मैं। गुजरा हूं सिर्फ एक साधारण स्थिति से ही, परिस्थितियां इससे भी भयावह होती...
पुस्तक समीक्षा - वह साँप सीढ़ी नहीं खेलता! गणेश गनी का कविता संग्रह "वह साँप सीढ़ी नहीं खेलता" लोकोदय प्रकाशन से जनवरी 2019 में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में 59 कवितायेँ हैं और लगभग सभी छोटे आकार की ही...
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