पुस्तक समीक्षा – वह साँप सीढ़ी नहीं खेलता

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पुस्तक समीक्षा – वह साँप सीढ़ी नहीं खेलता!

गणेश गनी का कविता संग्रह “वह साँप सीढ़ी नहीं खेलता” लोकोदय प्रकाशन से जनवरी 2019 में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में 59 कवितायेँ हैं और लगभग सभी छोटे आकार की ही हैं। छोटी और मारक कविताएँ उबाऊ नहीं होतीं और पाठक की उत्सुकता को बढ़ाती हैं।

गणेश गनी का इससे पहले कविता संवाद “किस्से चलते हैं बिल्ली के पांव पर !” आ चुका है, जो अपनी रोचकता के कारणों से चर्चा में रहा है। गणेश गनी की इन 59 कविताओं से गुजरते हुए आप स्वयं को कभी गहरी नदियों में कभी ऊँचे पहाड़ों पर विचरते देखेंगे, इन्होने जिस खूबसूरती से पांगी के जनजातीय और पिछड़े क्षेत्र की पीड़ा को शब्दों में पिरोया है उस से इस बात को महसूस किया जा सकता है की उस घाटी के लोग आज भी शेष संसार से कितना कटे हुए हैं। घाटी के लोगों की दैनिक दिनचर्या से लेकर वहां के रीति रिवाज़ इनकी रचना शिल्प से अपनी बात कह रहे होते हैं।

गनी की कवितायेँ अपने आप में नई हैं और नए आयाम लेकर रची गई हैं, ये अलग किस्म की कवितायेँ इस संग्रह में लेकर आये हैं, किसान, बेरोज़गार और गरीब की दुर्दशा अपने ही तरीके से रचते हैं जैसे एक कविता है – “उसकी वीरगाथा” यह कविता बहुत कुछ बोलती है, बस सुनने(पढ़ने) वाले के कान सही ढंग से खुले होने चाहिए, इसी कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिये –

उसे यूँ ही कायर कहा गया !
जबकि इस घटना से पहले
बड़े ही साहस से किया सब सहन
उसने यूँ ही नहीं की आत्महत्या
वो जानता है
मिटटी नहीं मौसम उगाता है फ़सल
पर अभी मौसम प्रतिकूल है

जरा ग़ौर फरमाइए ये पंक्तियाँ किसान की जद्दोजहद का वर्णन कितनी सादगी और साफ़ साफ़ शब्दों में करती हैं।

गणेश गनी की कविता “विकल्प” को पढ़ने के बाद लगता है कि लोग बड़े होने के बाद सच में या जानबूझ कर चुनते हैं गलत विकल्प जबकि बच्चे ही जानते है सही विकल्प, शुरआती पंक्तियाँ देखिये –

कितनी आसानी से
भर देते हैं रिक्त स्थान बच्चे
चुनकर सही विकल्प।
हम कितनी ही बार
चुनते हैं गलत विकल्प
और भर देते हैं
जीवन में रिक्त स्थानों को
जो फिर खाली हो जाते हैं
फिर भर जाते हैं
फिर खाली जो जाते हैं
और हम फिर भर देते हैं। …….

“यह समय नारों का नहीं हो सकता”, “वह झरने से लौट आया !” , “जोबनू”, “ये डरे हुए लोग” जैसी और भी कवितायेँ दिल तक उतरती हैं और आपसे बातें करती है, कभी प्रेरित करती हैं और कभी कहती हैं अभी सुस्ताने का समय नहीं है यह समय है झूठ से डट कर सामना करने का !

और कवि कितना संवेदनशील होता है यह इनकी कविता “तीन दोस्तों का जाना” कविता पढ़ने के बाद समझा जा सकता है जब कवि अपनी पुरानी खट्टी मीठी यादों में खो जाता है तो संवेदना शब्दों से स्वत फ़ूटट जाती है। गणेश गनी ने जिस तरह आसान बिम्बों और प्रतीकों को अपनी रचना शिल्प में रचा है वो ज़मीन से जुड़ा कवि ही कर सकता है। बिम्ब अचंभित करते हैं। सीधे-सीधे और स्पष्ट रूप से कवितायेँ पाठक से बातें करती हैं, कुछ एक स्थानीय शब्दों को छोड़ कर बाकी शब्द चयन भी गज़ब है। गनी की अपनी भाषा है जो इन्हें अन्य कवियों से अलग खड़ा करती है। कवि पाठक को कविता से जोड़े रखते हैं। कवि का काम ही होता है समाज की कुरीतियों पर कड़ा प्रहार करना और लोक और समाज की समस्या पर प्रखर वक्ता की तरह आवाज बुलंद करना। गणेश गनी ने भी समकालीन और जन समस्याओं को प्रमुखता से उठाया है। कवि ने अपनी कविताओं में नए मुहावरे गढ़े हैं। कविता में स्थानीयता का प्रयोग कविता को ताकतवर बना गया है।

-बलवन्त नीब

 

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