अपनी अपनी शाम

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कविता – अपनी अपनी शाम

१.                          बेनाम सी जिन्दगी जीने लगे है,
हर शाम अब पीने लगे है।
नाकामी का ठीकरा,
रोज भरता है,
रोज टूटता है।
फिर दिल में दर्द फूटता है,
दर्द भुनाने को अब,
हर शाम पीने लगे है।

२.                               सारी हवा में घुला जहर है,
हर पल गिरता, मुझ पर कहर है।
पगार से उधार हो गई,
उदार से बेकार हो गई,
कभी थी जीने की हसरत
अब कसरत हो गई,
इसी कसरत के लिए अब,
हर शाम पीने लगे है।

३.                                               यादें ही बाकी है,
उन हसीन पलों की,
जब एन सुर्ख लवों पे,
मुस्कराहट अपनी चांदनी बिखेरती थी।
जिन्दगी की इस जुस्तजू पे,
सहारे को जरुरत थी।
सहारा पाने के लिए अब,
हर शाम पीने लगे है।

४.                                               आँखों के नीचे पड़ गई छाई,
दूर भागती ये परछाई,
वक्त से न वफा घबराई,
कब ख़त्म होगी ये लड़ाई,
इसी लड़ाई को लड़ने के लिए अब,
हर शाम पीने लगे है।
५.                                                                           हसरत है,
नाचें बाजे-गाजे  में,
जाएँ किसी के जनाजे में,
पर,
जहाँ जायेगें,
खुद को अकेला पायेगें।
कोई बात नहीं करता,
कोई साथ नहीं देता,
झूठ है हर रिश्ता।
इसी झूठ को भुलाने के लिए अब,
हर शाम पीने लगे है।
६.                                                                   द आते है,
बचपन के दिन,
वो दोस्ती,
जो फायदा देख कर,
नहीं होती थी,
बस हो जाती थी।
अब तो कोई दोस्त नहीं,
कोई सगा नहीं,
जहाँ मधु है,
वहीँ मखियाँ है,
होता पल – पल धोखा है।
इसी धोखे से बचने के लिए अब,
हर शाम पीने लगे है।
७.                                                                           वो भी दिन थे,
जब सवेरे उठने पर,
मिलती थी, चाय की प्याली,
अब सिर्फ,
मिलती है गाली।
क्या करें,
किसी का नहीं कसूर,
ज़माने का है यही दसतूर,
यहाँ होती उसी की पहचान है,
जो होता महान है।
सफलता भी भेदभाव करती है,
मुझसे क्यों डरती है।
क्या नहीं किया
रात तो भी दिन किया।
पर मिली सिर्फ नाकामी है
कब तक,
नाकामी का बोझ उठाऊंगा,
न जाने कब,
गहरी नीद,
सो जाउगां।
इसी नाकामी को मिटने के लिए अब,
हर शाम पीने लगे है।
८.                                                                      खतरों से खेलने वाला,
खुद से भी डरता है,
दौड़ने वाला,
अब चलने से कतरता है,
दूसरों को राह दिखने वाला
आज,
राह पाने को तरसता है,
वक्त से हारे खिलाडी को
बर्बादी का इनाम मिला है।
इस इनाम की ख़ुशी में अब,
हर शाम पीने लगे है।
९.                                                          ख्वाबों की कोई कीमत नहीं,
यहाँ तो इमान बिकता है,
हर सामान बिकता है।
मेहनत से मिली लाचारी,
बढती जा रही है बीमारी।
इस बीमारी से छुटकारा पाने के लिए अब,
हर शाम पिने लगे है।
१०.                                               हर किसी की नफरत का शिकार हूँ,
व्यंग्य बाणों से जर्जर हो चूका हूँ।
लोगो हसते है,
कसीदे कसते है।
मजाक का पात्र हूँ,
अंदरूनी घुटन से घुटता जा रहा हूँ,
बहार से भी टूटता जा रहा हूँ ,
गुस्से से भरता जा रहा हूँ।
इसी गुस्से को ठंडा करने के लिए अब,
हर शाम पीने लगे है।
११.                                                                  आज हालात ने कहाँ ला के,
खड़ा कर दिया है,
चरों तरफ फैला अन्धकार,
धुआं और ये सन्नाटा,
मुझे निगलने का इंतजार कर रहा है।
कोई साथी नहीं,
कोई सहारा नहीं,
किसी से गिला,
किसी से सिकवा नहीं।
जी भर ले रोने के लिए,
अब आँखों में पानी नहीं।
न रही जीने की लालसा,
न मरने की हताशा,
न मिली किसी की दिलासा।
ख़त्म होते इंतजार को,
ख़त्म करने के लिए अब,
आखिरी शाम को पीने लगे है।
ये शान, ये शाम,
फिर ज आयेगी,
जिन्दगी अब और न तरसाएगी,
मौत मुझे गोद में उठाएगी।
बदनामी अब और न सताएगी,
ये शान भरी शाम, कब,
कब तक मुझे पिलाएगी।
कब तक मुझे पिलाएगी।
– ‘नीब’
16 दिसम्बर, 2008 

1 COMMENT

  1. स्पर्श चौहान
    बहुत शानदार अभिव्यक्ति साहब। दर्द और कसक से उद्वेलित भावनाओं को उकेरती रचना जिंदगी के उदासी भरे माहौल को सुंदरता से उजागर करती है। वक्त की बेबाकियां सदैव ही मनुष्य को प्रतिकूल अवस्था में स्तंभित करने का यत्न करती है । इन गर्दिशों मे सांसे जैसे ठहर सी जाती है लेकिन गहरे ज़ख्मो से छलनी रात तन्हाई को पीने लगती है और फिर से एक सुबह की झलक जिंदगी के नए पहलू को प्लावित करने लगती है उदासियों से बिछड़कर ,उमंगों के वैभव भरे संसार में।

    सुन्दर रचना हेतु शुभकामनायें

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