दो कवितायेँ – दर्द और है ज़िन्दगी

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 1. दर्द

दर्द को समझने के लिए
पहले मैंने बाजू में चीरा लगाया,
फिर भी मुझे,
वह दर्द महसूस नहीं हुआ।
फिर मैंने ज़ख्म में
नमक मिला लिया,
पर फिर भी मुझे,
उतना दर्द नहीं हुआ।
मैं समझ नहीं पा रहा था
आखिर क्यों…
वह दर्द खुद को यातना देने पर
भी नहीं आ रहा था।

जब मैंने उसे लाचार
और तड़फते हुए देखा था
उसका दर्द मेरे सीने को चीर रहा था
उसकी मूक पुकारें
मेरी कमजोरी को झकझोर रही थी,
वह मेमना लोगों की
ईश्वर को भेंट थी।
उसका खून मेरे अंदर
ज्वालामुखी से भी ज़्यादा
उबाल खा रहा था।
और मैं अंदर ही अंदर
ईश्वर की सत्ता को लात मार रहा था।

2. है ज़िन्दगी

है ज़िन्दगी
कुछ वफ़ा
कुछ मुहब्बत
कुछ ख़फ़ा भी।

है ज़िन्दगी
कुछ मासूम
कुछ तन्हा
कुछ बेवफ़ा भी।

है ज़िन्दगी
कुछ जुनून
कुछ सब्र
कुछ कशिश भी।

है ज़िन्दगी
कुछ ख़ुशनुमा
कुछ रंगीनियां
कुछ बेरंग भी।

है ज़िन्दगी
कुछ ख़्वाब सी
कुछ उलझे ख़्याल सी
हकीकत भारी किताब भी।

ज़िन्दगी…
थोड़ी साँसे हैं
हिसाब की,
नफ़े हैं
नुकसान भी ।

– बलवंत नीब

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