कविता – शीत युद्ध अंतर्मन का

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शीत युद्ध – अंतर्मन का

किसी ओर से लड़ने से अच्छा
कि लड़ लूं
कुछ देर खुद से
बता दूं,
इन काग़ज़ों के मार्फत
तुम्हें भी
कि, अंतर्मन की लड़ाई ही है
सबसे बड़ा शीत युद्ध।

ऐसा युद्ध
जिसमें होते हैं
दो बराबर पक्ष,
होती हैं,
अतीत की गलतियां
होते हैं,
भविष्य के सपने
और दिमाग घूम रहा होता है
पहिये के माफिक!
ठंडी हवाओं में भी
चेहरा हो जाता है
आग जैसा!
अतीत में
उल्टे कदमों के निशान
बार – बार
उभरते रहते हैं
जैसे, येति के पांव के चिन्ह।

इसी कशमकश में
इंसान,
अंधेरी राहों में भी
ढूंढता रहता है
एक रोशनी की किरण
ऐसी रश्मि,
जो उसे बचा सके
येति से नहीं
बल्कि खुद के अतीत से
क्योंकि,
अनकहे निशानों की छाप
होती है
बड़ी ही अमिट।

इस युद्ध में
फैसला नहीं होता
हार-जीत का
या तो
इंसान डूब जाता है
समंदर के अंतस तक
या
जिंदगी दे गर एक और मौका
तो, वो
सीख जाता है
कभी भी, न
डूबने का हुनर।

– दीपक भारद्वाज

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