क्योंकि मैं इन्सान नहीं (कविता)

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क्योंकि मैं इन्सान नहीं।

मैं हिंदू हूं, मैं मुस्लिम हूं,
मेरी और कोई पहचान नहीं,
क्योंकि मैं इंसान नहीं।

अपनों की छोटी सी चोट पर,
जो खून खौलता है मेरा,
गैरों की जो जान भी ले लूं,
उसी खून के ठंडेपन से,
मैं बिलकुल हैरान नहीं,
उनकी जान कोई जान नहीं,
क्योंकि मैं इन्सान नहीं।

मंदिर भी है, मस्जिद भी है,
खुदा नहीं ,भगवान नहीं,
चारों तरफ सब भूखे हैं,
अब बचा कोई किसान नहीं,
क्योंकि मैं इंसान नहीं।

चाट रहा हुं तलवे, आंख मूंदकर,
अब बाकि कोई आत्मसम्मान नहीं,
क्योंकि मैं इंसान नहीं।

गुलामी ने जो एक किया था,
हर कोई हिंदोस्तानी था,
अब आजादी भी है
हिंदू ,मुस्लिम और सभी है,
पर वो हिंदोस्तान नहीं,
क्योंकि मैं इंसान नहीं।

पाश्चात्य कपड़े डालकर जो वो अकेले बाहर चलती है,
इसमें बाहर घूम रहे उन गिद्धों की क्या गलती है?
दोषी तो केवल वो ही है,वो गिद्ध तो कोई हैवान नहीं,
क्योंकि मैं इन्सान नहीं।

जो भी हो रहा है समाज में,
उससे मैं अंजान नहीं,
पर होता मैं परेशान नहीं,
क्योंकि मैं इन्सान नहीं।

पाप किए हैं जितने मैंने गिनना उनको आसान नहीं,
धुल जाएं ये पाप जहां,
ऐसा कोई शमशान नहीं,
ऐसा कब्रिस्तान नहीं ,
क्योंकि मैं इंसान नहीं

बातें ये जो मुझ में हैं,ना इनसे तू शर्मिंदा हों,
मर चुका जो इंसान मेरे अंदर,
क्या पताअभी तुझमें जिंदा हो,
मरने न देना वो इन्सान कहीं,
इन बातों से तू मेरी, होना जरा भी परेशान नहीं,
क्योंकि मैं इन्सान नहीं।

-super RK

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