किन्नौर डायरी – सांगला से सांगला कंडे की सैर

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सांगला कंडे आने की इच्छा बहुत समय से थी, लेकिन आज  पूरी  हूई थी। आज का प्लान भी अचानक ही बना था, बातों बातों में ही महेश सर आज साथ आने को तैयार हो गये, रही बात हमारी हम तो कब से तैयार बैठे थे। सुबह के लगभग 6:30 पर सांगला से निकले और कब कड़े पहुंचे पता ही नहीं चला, प्रकृति के नजारे, हरे भरे जंगल, सेब के बगीचे, नदी, झरने, पहाड, जंगली फूल,और घास चरती गायें  देखते देखते सांगला कंडे पहुंचना अपने आप में ही एक अनोखा अनुभव था। भोजपत्र के पेड के पास बैठकर आराम किया। और आगे बढे, कुछ समय कंडे झील के बीच बैठे रहे और झील का अवलोकन किया अपितु झील में पानी बहुत कम था।

जब सांगला कंडे पहुंचे तब धूप इतनी तेज़ थी और कुछ ज्यादा ही चुभने लगी थी । पैदल चलने के कारण थोडी सी थकान और  गर्मी महसूस होने लगी थी। घडी का कांटा सुबह के 10:23  की तरफ इशारा कर रहा था। उस समय जूते खोलकर पांव ठंडे पानी में डालने का एहसास कुछ और ही था।

मैं उस समय सांगला  कंडे (3568m) में था और मेरे साथ थे मेरा भांजा रोनू और महेश सर।

हमें लगभग 3 घंटे का समय लगा। जबकि स्थानीय लोग जो काम के सिलसिले मे कंडे आते जाते रहते हैं, वे 2 घंटे में ही ये सफर तय कर लेते हैं। वैसे तो सांगला कंडे तक सडक पहुँच चुकी है, 4×4 गियर वाली गाडी द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। अगर आप के पास समय की कमी नहीं है और आप ट्रैकिंग के शौकिन है तो पैदल रास्ते में बेहतरीन प्राकृतिक नजारे आपके सफर को ज्यादा दिलचस्प बना देंगे।

कंडे का नजारा सफर के नजारे से पूरी तरह से अलग था। अब चारो तरफ हरी घास थी । पेड बिल्कुल भी न थेपहाड़ियों की ढलान बहुत कम हो गई थी। पत्थर और लकडी से बने छोटे मकान जिन्हे दोघरी कहते हैं, खुबसूरती में चार चांद लगा रहे थे। ओगला व फाफरा के खेतॊं में फसल लहलहा रही थी।

पास में ही ट्रैकर के लिए बेस कैम्प है। यंहा से आप रूपिन पास, शिवलिंग पास तथा अन्य स्थानों के लिए ट्रैकिंग पर जा सकते हैं। कंडे की हसीन वादियों में घूमने के बाद हमने अच्छी जगह देख कर,लकड़ियाँ तथा पानी का जुगाड कर मैगी बनाई। पेट पूजा के बाद वापिस सांगला की तरफ बढ गये ।

यह एक अविस्मरणीय दिन था !!
मोबाइल फ़ोन से खीचीं गई कुछ फोटोज :-

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