Home पर्यटन किन्नौर डायरी – छितकुल, भारत का अंतिम गांव

किन्नौर डायरी – छितकुल, भारत का अंतिम गांव

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कालेज की छुट्टियो में किन्नौर घुमने आये मेरे भांजे को किन्नौर के दर्शनीय स्थल दिखाने का जिम्मा मेरे उपर था।किन्नौर के दर्शनीय स्थलों की बात हो और छितकुल का नाम न लिया जाए तो इसे गुस्ताखी ही कहा जाएगा। छितकुल सांगला से 24 कि०मी०, तथा जिला मुख्यालय रिकांगपिओ से 66 कि०मी० की दूरी पर है। अगर आप छितकुल जाने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करना चाहते हैं,तो आप को सुबह 8:00 बजे HRTC की बस, 11:00 बजे HRTC की कैब, 12:00 बजे HRTC बस,  2:30 दोपहर को HRTC बस, और शाम 5:00 बजे प्राइवेट बस सांगला से मिल जाएगी ।

रविवार की सुबह हम मण्डी-सांगला-रक्षम बस से छितकुल निकले जो सांगला से सुबह 8:00 बजे चलती है।बस पत्थरों को काटी हुई घुमावदार सडको से आगे बढने लगी। बाहर का दृश्य अत्यंत ही खुबसूरत था। बस बास्पा नदी के साथ साथ विपरित दिशा में चल रही थी। बास्पा नदी इस घाटी की मुख्य नदी है जिसके नाम पर इस घाटी को “बास्पा घाटी” के नाम से भी जाना जाता है।कलकल बहती नदी तथा उसके बहाव में अपना योगदान देते दुधिया नाले तथा झरने सफर को रोमांचकारी बना रहे थे। रास्ते में स्थानीय लोग जो पारम्परिक वेशभूषा में थे, बस में चढ उतर रहे थे ।महिलाएं ऊन के वस्त्र पहने हुए थी जिन्हे दोडू, तथा चोली के नाम से जाना जाता है गले तथा कान में सोने के आभूषण तथा कमर तक चांदी के भारी आभूषण पहन रखे थे। पुरुष ऊनी कोट में थे। हरे रंग की टोपी महिला तथा पुरुष दोनो ही पहनते हैं।

रास्ते में कई स्थान जैसे थैमगारंग, बटसेरी, खरोगला, रक्षम, मस्तरंग सडक के किनारे ही स्थित हैं।लगभग सवा नौ बजे हम छितकुल पहुँच गये। बास्पा नदी के बाईं ओर स्थित है भारत का अंतिम गांव छितकुल। बास्पा नदी के दाईं ओर जंगल है,लेकिन  बाईं  तरफ कोई बडा पेड नहीं  दिखता,जंगली झाडियां जिनपर लगे रंग बिरंगे फूल दिल को मोह लेते हैं। बस से उतरते ही सबसे पहली नजर जिस चीज पर पडी वो एक बोर्ड था जिस पर लिखा था “हिन्दुस्तान का आखिरी ढाबा “, सडक से थोडी सी दूर है “माता देवी जी ” का मदिंर। कहा जाता है देवी जी का मुख्य मंदिर 500 वर्ष पूर्व गढवाल के एक निवासी द्वारा बनवाया गया था।माता देवी जी के दर्शन के बाद हम गांव में घुमने निकले। लकडी के मकान,स्थानीय बेशभूषा में ग्रामीण,घर के बाहर लकड़ियों के ढेर, जिनमें भोजपत्र की लकड़ियां भी थी। प्राचीन समय में ग्रंथ भोजपत्र की छाल पर लिखे जाते थे  क्योंकि इसकी छाल बिल्कुल कागज की तरह होती है। गांव में लकडी से बने छोटे एक कमरे के मकान भी दिखे स्थानीय लोगों से पता चला कि सर्दी के मौसम में भारी बर्फबारी के कारण छितकुल देश के अन्य हिस्सो से कट जाता है जिस कारण ये लोग 6 महीनो का राशन  लकडी के इन कमरों में स्टोर करते है जिसे स्थानीय भाषा में उरछों कहा जाता है। इस गांव में घुमना  अदभुत तथा अकल्पनीय लग रहा था। गांव में एक किला तथा बौद्ध मंदिर भी हैं । गांव से थोडा उपर जाने पर हमें “घराट” देखने को मिले जिसमें पानी की शक्ति का इस्तेमाल चक्की द्वारा आट्टा पीसने के काम आता है, आज भी इस गांव में लगभग विलुप्त हो चुकी इस तकनीक को देखकर दिल खुश हो गया। झरने तथा जंगली फूलों की झाडियो के बीच से होकर गुजरते हुए हम छितकुल के एक ऊंचे स्थान पर पहुँचे,जहाँ पर बडी बडी चट्टानें थी।यहां से पुरा छितकुल गांव देखा जा सकता है। यहां से गाँव का जो नजारा नजर आता है उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। इस सुंदरता का अनुभव आप स्वयं यहां आकर ही कर सकते हैं। गांव में ओगला और फाफरा की फसल खेतों  में बोई हुई थी। नवम्बर से अप्रैल तक छितकुल बर्फ की चपेट में ही रहता है, जिसके कारण यहां सेब की फसल नहीं होती। यहां के लोगों का रहन-सहन सीधा सादा और सरल है। इस गांव की मुख्य फसलें ओगला, फाफरा, जौ, मटर, आलु व सरसों हैं जो वर्ष भर इनके लिए सहारा बनती हैं। यहां से हम बास्पा नदी के किनारे गये।नदी के पार जंगल का शांत वातावरण  आप के मन के सारे तनाव दूर कर देगा।

उंचे पर्वतों के बीच से नागिन की तरह बलखाती हुई बास्पा नदी का नजारा प्रकृति द्वारा बनाई एक बेहतरीन कलाकृति  का बेजोड नमूना प्रतीत होता है।

छितकुल से तीन कि.मी. आगे रानीकंडा में आईटीबीपी की चौकी है। इस चौकी से आगे किसी भी नागरिक का जाना वर्जित है क्योंकि छितकुल से लगभग 65 कि.मी. आगे चीन की सीमा आरंभ हो जाती है। हालांकि इसके आगे आईटीबीपी की दो और चौकियां भी हैं। छितकुल उत्तराखंड की सीमा से कुछ ही कि.मी. की दूरी पर है। यहां से उत्तराखंड ट्रेकिंग मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है। रविवार का यह दिन एक यादगार दिन रहा। शाम को 3:30 की बस से हम वापिस सांगला आ गये। अगर आप शाम को वहां रूकना चाहते हैं तो वहां आपको होटल मिल जाएंगे ।

मैं धन्यवाद करना चाहूंगा विकास सर का बेहतरीन ब्रेकफास्ट और लंच के लिए। सुनिल सर और डाक्टर साहब का जिन्होंने छितकुल के भ्रमण में हमारा साथ दिया।

– राजेंद्र कुमार 

यात्रा की कुछ तस्वीरें –

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