सविंधान की राह तलाशती पहाड़ी भाषा।

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Pic Credit - http://www.himachaltouristplaces.com/

हिमाचल प्रदेश देश भर में अपनी अनुपम व् अनूठी  संस्कृति के लिए विख्यात है। प्राचीनकाल से पहाड़ो में प्रश्रय लेती सभ्यता आज एक सांस्कृतिक रूप में हम सभी के बीच रीति- रिवाजों लोक प्रथाओं इत्यादि के वेश में विद्यमान है। नदियों ,नालों, झरनों पशुओं,पक्षियों इत्यादि प्राकृतिक वस्तुओं से आवेशित ध्वनियां, किसी प्रकार व्यवस्थित ध्वनियों की माला में संगठित हुई  जो की  एक भाषा के रूप में आज हम सबके सामने है।

आज हमारी पहाड़ी भाषा अपनी सवैंधानिक पहचान बनाने के लिए कई वर्षों से लगातार संघर्षरत है। पूरे प्रदेश को गौरवान्वित करने वाली पहाड़ी भाषा संविधान की आठवी अनुसूची में अपनी जगह बनाने के लिए पूरे लोकमत के साथ जद्दोजहद में है।हालांकि पूर्व और वर्तमान प्रदेश सरकार ने पहाड़ी भाषा को 8आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भरसक प्रयास किया है लेकिन ये प्रयास अभी तक सफल नहीं हो पाया है। 17 दिसंबर 2009 को भोटी भाषा को पहाड़ी भाषा के साथ 8वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए प्रदेश विधानसभा ने प्रस्ताव पारित करके केंद्र सरकार को भेजा था लेकिन उस प्रस्ताव पर केंद्र सरकार द्वारा कोई विशेष धयान नहीं दिया गया । संस्कृति के संरक्षण एवं प्रसार के लिए सम्भवतः प्रदेश सरकार का यह एक प्रभावशाली और सराहनीय कदम था।
हिमाचल प्रदेश को इसकी विशेष पहचान दिलाने मे पहाड़ी भाषा का अस्मरणीय योगदान है। पहाड़ी भाषा ही है जो पूरे प्रदेश को एक माला के रूप में जोड़े रखती है। जितनी पुरानी हिमाचल  की संस्कृति है उतनी ही पुरानी यहाँ की बोलियां जिन्हें संगठित रूप में पहाड़ी भाषा कहा जाता है।इस बात की स्पष्ट रूप से पुष्टि की जा सकती है कि हिमाचली भाषा की अनेक पहाड़ी बोलियां है जो हिमाचल और आसपास के सीमावर्ती क्षेत्रों में बोली जाती है,ही वास्तव में पहाड़ी भाषा का स्वरुप है जिसमे कि सिरमौर की जौनसारी, सिरमौरी(धारची), शिमला जिला की  क्योंथली, महासवी,सोलन की  बघाटी ,बिलासपुर की कहलूरी, मंडी की सुकेती ,हंदूरी, कुल्लू की कुल्लवी, चंबा की पंगवाली चम्बयाली,  कांगड़ा ,हमीरपुर ऊना में बोले जाने वाली कांगड़ी तथा किन्नौर और लाहौल स्पीति में बोली जाने वाली भोटी  इत्यादि शामिल है।

पहाड़ी भाषा का इतिहास अन्य भारतीय भाषाओं की तरह बहुत  प्राचीन है।यह अलग बात है कि अन्य भाषाओं की तरह पहाड़ी भाषा के साहित्य पथ में आने में काफी देर लगी है। लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अगर बात की जाये तो पहाड़ी भाषा में 300 से अधिक काव्य संग्रह , 20 से अधिक उपन्यास, 80 से अधिक कहानियां ,20 से अधिक निबंध और 30 नाटकों से सम्बंधित पुस्तकें मौजूद है साथ ही साथ पहाड़ी भाषा में प्रचुर मात्रा में लोक साहित्य, लोक गीतों, लोक गाथाओं, लोक नाटकों मुहावरों, कहावतों इत्यादि का भरपूर प्रकाशन हो चुका है।अगर पहाड़ी भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाता है तो निश्चित तौर पर इस भाषा में लेखन कार्य बढ़ेगा और पहाड़ी भाषा की अस्मिता का सरंक्षण होगा। पहाड़ी संस्कृति को पुनः प्रश्रय मिलेगा ।

पहाड़ी भाषा हिमाचल का भूतभविष है। हिमाचल का जो अनुपम  रूप आज हमारे सामने वो केवल पहाड़ी भाषा के कारण ही सम्भव् हो पाया है।लेकिन बड़ी चिंता का विषय है कि हम लोग अभी तक अपनी इस प्राचीन भाषा को राष्ट्रीय पहचान न दिला सके। हमे जरूरत है अपने वजूद को सवैंधानिक संरक्षण देने का। इसके लिए अधिक से अधिक पहाड़ी भाषा का प्रचार एवं प्रसार करना होगा। अधिक से अधिक पहाड़ी भाषा में लिखना होगा । प्रदेश सरकार को पहाड़ी भाषा का प्रसार करने के लिए नए कार्यक्रम और नई योजनाएं बनानी होगी। आने वाली पीढ़ियों को अपनी इस प्राचीन विरासत से अवगत कराना  होगा ताकि पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में वे अपनी इस गौरवशाली  संस्कृति से अछूते न रह जाये और  हमारी प्राचीन संस्कृति एक इतिहास बनकर रह जाये।हमारी संस्कृति का आधार हमारी भाषा ही है। सभी रीति-रिवाज, लोक कलाएं ,लोक गाथाएं इत्यादि भाषा से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है इसलिए भाषा को संरक्षण देना अत्यावश्यक है ताकि आने वाले भविष्य में पहाड़ी भाषा राष्ट्र की अन्य प्रांतीय भाषाओं की भांति पहली पंक्ति में खड़ी हो और हर हिमाचली गौरान्वित महसूस कर सके।

– स्पर्श चौहान

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