Friday, August 12, 2022
“कुछ तो करना होगा” हो रहा है आज जो दूसरों के साथ, कल तेरे साथ भी हो सकता है, तू  जो बना है आज तमाशबीन कल तमाशा तेरे साथ भी हो सकता है। क्यों पड़ूं मैं इन झमेलों में,इस सोच से तुझे...
एक बस सफर के दौरान बस में लिखे वाक्य “सोचो,साथ    क्या जाएगा”को पढ़ कर इस कविता का विचार मन में आया था। सोच,साथ क्या जाएगा? “अनमोल बड़ी है ये जिंदगी,खुशी से इसे  बीता ले तू। बड़े बड़े हैं सपने तेरे,हकीकत इन्हें...
जब गुजरता हूं खुद किसी भयावह स्थिति से, तो सोचता हूं अक्सर उसकी वजह  मैं। चाहता हूं मिटा दूं उस वजह को ही, पर लौट आता हूं अक्सर उसी जगह मैं। गुजरा हूं सिर्फ एक साधारण स्थिति से ही, परिस्थितियां इससे भी भयावह होती...
  वक्त का क्या कोई मोल है? वक्त बड़ा अनमोल है। जो वक्त की कीमत जानता है, उसे जमाना मानता है। हम ही बहते जाते हैं इस वक्त की धार में, वक्त कहां रुका करता है किसी के इंतजार में कम है वक्त बड़ा इस जीवन...
कविता – नए प्रतिबिम्ब खो गए हैं वक्त के आईने से, जो सपने संजोए थे मैंने, समेटने की, कि थी कोशिश बहुत, पर बिखर गए सैलाब बन कर। धूमिल होते आईने पर उभर रहे हैं, प्रतिबिम्ब नए नए ! मिलते नहीं निशाँ साफ़ करने पर भी, छिप गए हैं धूल में, करवट बदल कहीं……… रह...
कविता - दो चेहरे क्या तुमने कभी देखे हैं दो चेहरे वाले लोग ? गर नहीं देखे तो अपने अंदर झांक ले । पूछ ले अपने अंतर्मन से, अंतर्रात्मा को  ताक ले । क्या तेरे दो चेहरे नहीं ? एक चेहरा जो दिखता है...
जहां हम रहते हैं जहां हम रहते हैं वहां हमारे पड़ोस में बहती है नदी बच्चों की तरह चंचल हड़बड़ी में मैदानों की ओर भागती हुई पड़ोस में जंगल है देवदार के पेड़ों से भरा हुआ हमारे लिये किसी सगे सा इस जंगल को कटने से बचाने के...
कविता-आस्तिक या नास्तिक? उसने पूछा कि तुम आस्तिक हो या नास्तिक? मैं कुछ ठिठका,क्योंकि इस बारे में सोचा न था अभी तक। सोच के मैं बोला, इस बारे में मेरा जवाब नहीं है निश्चित । क्या है मेरी मनोदशा वास्तविक? मैं आखिर आस्तिक हुं...
सर्द हवाओं के झोकों ने एक दम से करमू को झकझोर सा दिया। जाड़ों की धुप आदमी को कितना आलसी बना देती है, यही सोचते हुए करमू फिर से बचपन की यादों में खोने लगा। दो भाइयों में छोटा था करमू,...
??????? बस एक नजर देखने भर से तुम जैसे ह्रदय मे उतर आती हो, हज़ारों परियां सुन्दरता का शगुन लेकर जैसे आँखों मे ठहर जाती हो, तुम्हारी हलचल को ही तो सहेजता रहता हूँ हरपल तुमसे निकली , तुम ही तो, मेरी कविता हो......! मुझे देखकर तुम कुछ कहती भी नहीं लेकिन...
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