किन्नौर डायरी – फूलैच-फूलों का उत्सव

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त्यौहार चाहे कोई भी हो,हर किसी को इनका इंतजार रहता है। और इंतजार हो भी क्यों ना? आजकल की व्यस्तता भरी जिंदगी में ये त्यौहार ही हैं जो हमें अपने अपनों से मिलने का अवसर प्रदान करते हैं।त्यौहारों में बनने वाले स्वादिष्ट पारम्परिक व्यंजनों की खुशबू बचपन की यादों को तरोताजा कर देती है।हिमाचल प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर विभन्न अवसरों पर विभिन्न प्रकार के त्यौहार मनाए जाते हैं।ये कहा जाए कि ये त्यौहार अपने आप में संपूर्ण संस्कृति का समावेश होते हैं,तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।क्योंकि इन त्यौहारों में आपको पारम्परिक बेशभूषा, लोकगीत, लोकनृत्य, वाद्य यंत्र,तथा पारम्परिक पकवान सबकी झलक मिल जाती है। त्यौहार आज भी हिमाचल की समृद्ध संस्कृति को संजोये रखने में  खास किरदार  बने हुए हैं।अगर बात किन्नौर जिले की हो तो यहां की संस्कृति हिमाचल की समृद्ध लोक संस्कृति को चार चांद लगाने में कोई कसर  नहीं छोडती।किन्नौर के त्यौहारों का जिक्र हो तो मन में पहला नाम “फूलैच” का आता है।
जैसा की नाम से ही पता  चलता है  फूलैच का अर्थ है फूलों का त्यौहार ।इस त्यौहार को “उख्यांग” के नाम से  भी जाना जाता है।जिसमें ‘उ’ का अर्थ है फूल और ख्यांग का अर्थ है देखना।अर्थात फूलो की ओर देखना।यह त्यौहार भाद्रपद मास (अगस्त एवं सितम्बर)  के महीने में किन्नौर के भिन्न स्थानों में अलग-अलग समय मनाया  जाता है।किन्नौर में फूलैच की शुरुआत रूपी  गांव से होती है।सांगला घाटी में इस त्यौहार को सितम्बर माह की 5 तारिख के आसपास हर वर्ष बढ़ चढ़ कर मनाया जाता है।किन्नौर में ज्यादातर आबादी पर्वतों के निम्न या मध्यवर्ती भाग में बसी हुई है।क्योंकि पर्वतों के उच्च भाग अधिकांश समय बर्फ से लदे रहते हैं।पर्वत के इन उच्व क्षेत्रों को ‘कण्डे’ के नाम से जाना जाता है,जो की ग्रीष्म ऋतु में पशुओं की चारागाह के रूप में प्रयोग में लाए जाते हैं।वर्षा ऋतु में हिमालय के इन ऊंचे पर्वतों पर रंग बिरंगे फूल खिलते हैं।फूलैच के अवसर पर  स्थानीय देवता द्वारा नमित कुछ लोग इन फूलों को एकत्रित करते हैं तथा फूलों की माला बनाकर देवता को चढाई जाती है।इन फूलों  में से प्रमुख फूल होता है “ब्रह्म कमल” जिसका उल्लेख प्राचीन धार्मिक ग्रंथो में भी मिलता है।यह एक दुर्लभ,औषधीय गुणों युक्त तथा बेहद ही खुबसूरत फूल है जो कमल की भांति कीचड में नही अपितु जमीन पर उगता है।इसकी खुशबू अत्यंत ही मादक होती है।

इस पुष्प की मादक सुगंध का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है जिसने द्रौपदी को इसे पाने के लिए व्याकुल कर दिया था।कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु हिमालय क्षेत्र में आए तो उन्होंने भोलेनाथ को 1000 ब्रह्म कमल चढ़ाए, जिनमें से एक पुष्प कम हो गया था। तब विष्णु भगवान ने पुष्प के रुप में अपनी एक आंख भोलेनाथ को समर्पित कर दी थी। तभी से भोलेनाथ का एक नाम कमलेश्वर और विष्णु भगवान का नाम कमल नयन पड़ा। हिमालय क्षेत्र में इन दिनों जगह-जगह ब्रह्म कमल खिलने शुरु हो गए हैं।

एक अन्य कथा के अनुसार जब द्रोपदी ने भीम से हिमालय क्षेत्र से ब्रह्म कमल लाने की जिद्द की तो भीम बदरीकाश्रम पहुंचे। लेकिन बदरीनाथ से तीन किमी पीछे हनुमान चट्टी में हनुमान जी ने भीम को आगे जाने से रोक दिया। हनुमान ने अपनी पूंछ को रास्ते में फैला दिया था। जिसे उठाने में भीम असमर्थ रहा। यहीं पर हनुमान ने भीम का गर्व चूर किया था। बाद में भीम हनुमान जी से आज्ञा लेकर ही बदरीकाश्रम से ब्रह्म कमल लेकर गए।यह उतराखण्ड का राज्य फूल भी है।फुलैच के दिन देवता को चढाए गये फूल ही प्रसाद स्वरूप लोगों को बांटे जाते हैं। पितृ पक्ष होने के कारण लोग अपने पुर्वजों को याद करते हैं तथा उन्हे भोज्य सामग्री अर्पित करते हैं।देवता फसलों तथा मौसम  संबंधी भविष्यवाणियां करते हैं।फूलैच के अवसर पर पूरा  दिन लोग पारम्परिक बेशभूषा में स्थानीय वाद्य यंत्रों तथा लोकगीतों की धुन पर लोकनृत्य “क्यांग” का आनंद लेते हैं।पूरा दिन हर्षोल्लास का माहौल रहता है।पारम्परिक व्यंजन बनाए जाते हैं,तथा मिल बांट कर खाए जाते हैं।साथ ही साथ शराब तथा मांस का दौर भी चला रहता है।
अगर आप किन्नौर की सम्पूर्ण संस्कृति का अनुभव एक ही दिन में लेना चाहते हैं तो फूलैच से बेहतर  आपको दूसरा अवसर शायद ही मिले।

– राजेंद्र कुमार 

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